दशहरा : कल और आज




काफी दिनों बाद आज ब्लॉग लिखने का मन हुआ. दशहरा बीत गया है. हर त्योहार की तरह इस बार भी घर नहीं जा पायी. ऑफिस से छुट्टी नहीं मिली बस ये एक बहाना काफी है खुद को समझाने के लिए. खैर रावण दहन तो हो  ही गया. पर बचपन के दशहरे सा उत्साह नहीं रहा. दुर्गा पूजा शुरू होते ही मंदिरों की सजावट..पंडाल का बनना. मोहल्ले  की रामलीला मेंं राम लक्ष्मण को देखने से ज्यादा उत्साह सीता बने लड़के को देखने का होता था. बात ज्यादा नहीं ,  यहीं १०-११ साल पुरानी  है. तब भी कोई लड़की मोहल्ले की सीता नहीं बनती  थी. और हनुमान जी की पूँछ  कितनी लम्बी होगी इस बार..ये बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न होता था ।
बहुत खुशकिस्मत हूँ की ऐसे माहौल में पाली बढ़ी जहां आस पास मैंने हर समुदाय की परम्परा देखी  है.
 पास में बंगालियों की एक कॉलोनी थी. पापा बताते हैं  जब बांग्लादेश विभाजित हुआ तब उन्हें यहाँ जमीन देकर बसाया गया. दुर्गा पूजा और बंगाली समुदाय..उत्साह की कोई सीमा नहीं. उनकी आरती मेरे लिए किसी रोमांच से कम नहीं थी. हाथों में धुप के दीए लेकर  नाचना... और थाल पीट कर आरती गाना। 



मेरे उस छोटे से शहर में रावण दहन बड़े जोरो-शोरों से होता था. शाम सात बजे से हीं लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो जाती थी. वो मैदान एक मारवाड़ी मंदिर का था और मारवाड़ी अपनी परम्परा को बखूबी निभाते है. दुर्गा पूजा के नवमी के दिन माँ दुर्गा के नौ रूपों की झांकी भी मैंने उन्ही के बदौलत देखी  है. मेले में घूमना और अपने पसन्दीदा अभिनेता-अभिनेत्रियों की पोस्टर खरीदना तब मेरे लिए किसी खजाने से कम ना थी.  
खैर, वो दशहरा अब आ नहीं सकता. और इस बार तो  कमरे की चार दीवारी के अंदर अपने लैपटॉप पर आँखे गड़ाए बस बिता दिया.   

इस बार भी रावण जल चुका  है. साथ में एक दुखद समाचार, अमृतसर में रावण दहन देखते हुए रेल दुर्घटना में ६० लोगों की मौत हो गयी. भगवान उनकी आत्मा को शांति दे. 
दूर कहीं महिसासुर की त्राहिमाम की आवाज़ सुनाई पड़  रही.... और दुर्गा माँ इस बार भी उसका वध कर अंत कर देंगी. अगले साल फिर दशहरा  आएगा.  हम्म्म.... खैर इस बार कल के दशहरा को याद करते हुए बीत गया आज का  दशहरा। .. 

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