बचपन



बचपन किसी भीड़ भाड़ वाले शहर में नहीं बिताया। इसीलिए कभी रफ़्तार में भागने की आदत नहीं पड़ी। शायद यही कारण है, गलियों और नुक्कड़ से ज़्यादा लगाव रहा है। वह खट्टी पानीपूरी या झाल वाली मुढ़ी। उन सब की धुंधली-सी यादें आज भी जेहन में हैं। घर वालों से छिप छिपाकर जाना, तीखी-खट्टी पानीपूरी और झाल वाली मुढ़ी, उसका स्वाद आज भी याद करके मुहँ में पानी भर आता है। वो नुक्कड़ वैसा का वैसा ही है। हाँ, पर बहुत कुछ बदल चुका है। अब वहाँ कोई पानी पूरी वाला नहीं आता। ना झाल मुढ़ी वाले की साइकिल दिखती है। बहुत दूर तक खालीपन है। उस खालीपन की खामोशियों में मैं उस खट्टे पानी का स्वाद ढूंढती हूँ।

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